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शिमला केएनएच नवजात अदला-बदली मामले में बड़ा फैसला, सरकार देगी 30 लाख मुआवजा

केएनएच में नवजात बदलने के मामले में सरकार को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश
कोर्ट ने अस्पताल में ड्यूटी के दौरान हुई लापरवाही के लिए राज्य सरकार की जवाबदेही तय की
डीएनए जांच से खुला राज, हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद शीतल को मिला अपना जैविक बेटा


शिमला में नवजात बदलने के चर्चित मामले में अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार को पीड़िता शीतल ठाकुर को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। सिविल जज कोर्ट नंबर-5 में सिविल जज सुष्मिता शर्मा की अदालत ने कमला नेहरू अस्पताल (केएनएच) में प्रसव के दौरान हुई गंभीर लापरवाही को लेकर यह फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि सरकारी अस्पताल में तैनात डॉक्टरों और कर्मचारियों की ड्यूटी के दौरान हुई लापरवाही के लिए राज्य सरकार की वाइकेरियस लायबिलिटी बनती है।

यह मामला वर्ष 2016 का है, लेकिन करीब एक दशक बाद आए अदालत के इस फैसले ने उस घटना की गंभीरता को फिर सामने ला दिया है। मामला केवल अस्पताल की लापरवाही तक सीमित नहीं था, बल्कि एक मां को अपने ही नवजात बच्चे की पहचान को लेकर जिस मानसिक और भावनात्मक पीड़ा से गुजरना पड़ा, उसने पूरे मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया था।

प्रसव के बाद परिवार को बताया गया था बेटा होने की बात

संजौली निवासी शीतल ठाकुर 26 मई 2016 को प्रसव के लिए कमला नेहरू अस्पताल में भर्ती हुई थीं। रात करीब 11:10 बजे उन्हें लेबर रूम में शिफ्ट किया गया। प्रसव के बाद ड्यूटी पर मौजूद आया ने परिजनों को सूचना दी कि शीतल ने बेटे को जन्म दिया है

लेकिन इसके कुछ ही समय बाद स्थिति ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। महिला को एक नवजात बच्ची सौंप दी गई। परिवार ने जब बच्चे को देखा तो उन्हें संदेह हुआ, क्योंकि उन्हें पहले बेटे के जन्म की जानकारी दी गई थी। इतना ही नहीं, बच्ची के कपड़े भी बदले हुए थे।

परिजनों ने अस्पताल कर्मचारियों के सामने तत्काल आपत्ति जताई और इस संबंध में शिकायत भी की। परिवार की ओर से उठाए गए सवालों के बावजूद उस समय उनकी शिकायत पर तत्काल कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यही वह बिंदु था, जिसके बाद परिवार ने खुद सच्चाई सामने लाने का रास्ता अपनाया।

निजी लैब में कराई डीएनए जांच, सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई

परिवार का संदेह दूर नहीं हुआ तो दंपती ने निजी लैब में डीएनए जांच कराई। जांच रिपोर्ट ने परिवार की आशंका को सही साबित कर दिया। अस्पताल से सौंपी गई बच्ची उनकी जैविक संतान नहीं थी।

इसके बाद मामला कानूनी स्तर पर आगे बढ़ा। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत दोनों नवजातों का डीएनए मिलान कराया गया। इस जांच के माध्यम से दोनों बच्चों के जैविक माता-पिता की पहचान सुनिश्चित हुई।

डीएनए मिलान के बाद यह स्पष्ट हुआ कि अस्पताल में नवजातों की अदला-बदली हुई थी। इसके बाद शीतल ठाकुर को उनका जैविक बेटा वापस मिल सका

एक मां के लिए अपने नवजात बच्चे को जन्म देने के बाद उससे अलग हो जाना और फिर यह पता चलना कि अस्पताल से उसके पास अपना बच्चा नहीं है, किसी भी परिवार के लिए बेहद पीड़ादायक स्थिति हो सकती है। इस मामले में परिवार को न केवल अपने बच्चे की पहचान के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, बल्कि अस्पताल की व्यवस्था और जिम्मेदारी को लेकर भी लगातार सवाल उठाने पड़े।

अदालत ने राज्य सरकार की जवाबदेही तय की

मामले में शीतल ठाकुर ने न्याय और मुआवजे की मांग को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। सुनवाई के दौरान अस्पताल में कार्यरत कर्मचारियों की ड्यूटी के दौरान हुई कथित लापरवाही और उसके परिणामों को महत्वपूर्ण माना गया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी अस्पताल में कार्यरत डॉक्टरों और कर्मचारियों की ड्यूटी के दौरान हुई लापरवाही के लिए राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकती। इसी आधार पर अदालत ने हिमाचल प्रदेश सरकार को पीड़िता को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने केवल घटना के तत्काल प्रभाव को नहीं देखा, बल्कि सरकारी अस्पताल में मरीजों की देखभाल और नवजातों की सुरक्षा जैसी संवेदनशील जिम्मेदारियों में लापरवाही के लिए राज्य की जवाबदेही को भी रेखांकित किया है।

करीब दस साल बाद मिला कानूनी न्याय

शीतल ठाकुर का यह मामला वर्ष 2016 में सामने आया था। उस समय परिवार के लिए सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर प्रसव के बाद अस्पताल से उन्हें दूसरा बच्चा कैसे सौंप दिया गया। परिवार ने अपने स्तर पर जांच कराई, डीएनए परीक्षण कराया और फिर न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया।

अब अदालत के फैसले के बाद मामले में पीड़िता को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश हुआ है। यह फैसला सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में नवजातों की पहचान, सुरक्षा और अस्पताल प्रशासन की जवाबदेही को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नवजात बच्चों की अदला-बदली जैसी घटना में कुछ मिनटों की लापरवाही का असर परिवारों की पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में अस्पतालों की जिम्मेदारी केवल प्रसव कराने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जन्म के बाद बच्चे की पहचान, रिकॉर्ड और सुरक्षित रूप से सही माता-पिता को सौंपे जाने तक व्यवस्था की जवाबदेही बनी रहती है।

शिमला के इस मामले में भी परिवार के संदेह, निजी डीएनए जांच और बाद की कानूनी प्रक्रिया ने उस गलती की परतें खोलीं, जो अस्पताल में प्रसव के तुरंत बाद हुई थी। अब अदालत के फैसले ने इस मामले में सरकारी अस्पताल की लापरवाही और राज्य सरकार की जवाबदेही पर स्पष्ट न्यायिक रुख सामने रखा है।